Decoding Opex vs. Capex Solar Models in India
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भारत में सोलर सिस्टम की लागत: ओपेक्स v/s कैपेक्स मॉडल का खुलासा!

 

बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण और ख़त्म होते प्राकृतिक संसाधनों को ध्यान में रखते हुए हमें ज़्यादा से ज़्यादा स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा को उपयोग करने की आवश्यकता है। जब भी स्वच्छ और टिकाऊ ऊर्जा स्रोत की बात आती है, तब दिमाग में पहला नाम सौर ऊर्जा का ही आता है। जैसे-जैसे भारत में दोबारा उपयोग की जाने वाली ऊर्जा यानी सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ता जा रहा है, हमें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि हम सौर ऊर्जा पर अपना पैसा कैसे खर्च करना चाहते हैं। क्या यह एक नियमित खर्च (ओपेक्स) है या एक बार का बड़ा खर्च (कैपेक्स) है।

इस ब्लॉग में हम भारत के संबंध में ओपेक्स और कैपेक्स सोलर मॉडलों की बारीकियों के बारे में विस्तार से जानेंगे। इसके साथ ही हम यह भी जानेंगे कि दोनों माडलों में से सबसे बेहतर कौन सा है और उससे कौन-कौन से लाभ मिलते हैं। 

सोलर मॉडल को विस्तार से समझें:

ओपेक्स मॉडल – बचत के लिए टीम वर्क:

अगर इसे आसन भाषा में समझें तो, ओपेक्स मॉडल एक टीम वर्क की तरह होता है। इस मॉडल को अपनाने वालों को रिन्यूएबल एनर्जी सर्विस कंपनी (RESCo) नाम की एक कंपनी का साथ मिलता है। RESCo ही  ग्राहक के व्यवसाय या कंपनी की जगह पर सोलर पैनलों को लगाने और उसकी देखभाल में अपना पैसा लगाती है। कोई भी कंपनी, चाहे वह एक फैक्ट्री हो या बड़ा व्यवसाय हो, उसे इस मॉडल के अंतर्गत शुरुआत में बहुत अधिक कैश खर्च किए बिना ही सौर ऊर्जा का उपयोग करने का मौका मिलता है।

  • ज़्यादा पैसे खर्च करने की आवश्यकता नहीं: आमतौर पर, व्यवसायों को सोलर पैनल लगवाने के लिए बहुत अधिक पैसे खर्च करने की आवश्यकता होती है, लेकिन ओपेक्स मॉडल के अंतर्गत, RESCo ही इसका पूरा ध्यान रखती है। यह मॉडल उन व्यवसायों के लिए बहुत अच्छा है, जिनके पास बड़े सोलर प्रोजेक्ट्स पर खर्च करने के लिए ज़्यादा पैसा नहीं है।
  • पॉवर डील: RESCo और कंपनी एक पॉवर परचेज एग्रीमेंट (PPA) पर हस्ताक्षर करती हैं। यह एक सौदे की तरह है, जिसमें कहा जाता है कि, “हम आपको इस दर पर सौर ऊर्जा बेचेंगे।” इस तरह, कंपनी को यह पता होता है कि क्या अपेक्षा करनी है और वह अपनी ज़रूरतों के लिए बेहतर योजना बना सकती है।
  • टैक्स संबंधी लाभ: ओपेक्स मॉडल को और भी अधिक वित्तीय रूप से आकर्षक बनाने के लिए RESCo को कुछ कर लाभ भी मिल सकते हैं। यह बचत वाले केक के ऊपर चेरी की तरह है, जो मिल जाए तो अच्छा ही है।

 

कैपेक्स मॉडल – ख़ुद मालिक बनकर नियंत्रण करें:

ओपेक्स मॉडल के विपरीत कैपेक्स मॉडल में ग्राहक को सोलर सिस्टम लगवाने के लिए ख़ुद ही पहले पैसे खर्च करने पड़ते हैं। हालांकि, ख़ुद पैसे खर्च करने की वजह से सोलर सिस्टम लगवाने वाला व्यक्ति ही उसका मालिक होता है और उसका संचालन और रखरखाव भी स्वयं ही करता है। इस मॉडल के अंतर्गत ऊर्जा की लागत कम पड़ती है और अतिरिक्त ऊर्जा उत्पादन के बदले पैसे कमाने का भी मौक़ा मिलता है।

  • शुरुआत में खर्च करने पड़ते हैं ज़्यादा पैसे: कैपेक्स मॉडल के अंतर्गत ग्राहकों को शुरुआत में ख़ुद ही पैसे खर्च करने पड़ते हैं। इस खर्च में सोलर पैनलों की ख़रीद और उसे लगवाने की लागत शामिल होती है। हालांकि, सरकारी योजनाओं की वजह से प्रोत्साहन और सब्सिडी का लाभ लेकर इसके वित्तीय बोझ को कम किया जा सकता है।
  • ग्रिड से सस्ती बिजली: समय के साथ कैपेक्स मॉडल धीरे-धीरे लागत प्रभावी यानी सस्ता होता जाता है। इस मॉडल के अंतर्गत सोलर सिस्टम ग्रिड की तुलना में बहुत कम कीमत पर बिजली उत्पन्न करता है। इस मॉडल को अपनाकर लंबे समय में काफ़ी पैसे बचाये जा सकते हैं।
  • टैक्स संबंधी लाभ: कैपेक्स मॉडल के अंतर्गत ग्राहक तुरंत टैक्स संबंधी लाभ भी उठा सकते हैं, जिससे निवेश को कम करने में मदद मिलती है।

 

दोनों के बीच चुनाव को प्रभावित करने वाले कारक:

 

वित्तीय कारक:

  • पैसों की कमी: ओपेक्स मॉडल के अंतर्गत शुरुआत में बहुत कम या न के बराबर पैसे खर्च करने पड़ते हैं। ऐसे में अगर आपके पास शुरुआत में निवेश करने के लिए पैसे नहीं हैं, तो आपके लिए ओपेक्स मॉडल एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। इस मॉडल का ज़्यादातर उपयोग बड़े स्तर के सोलर प्रोजेक्ट लगवाने के लिए किया जाता है।
  • लंबे समय में बचत: वहीं, दूसरी तरफ़ कैपेक्स मॉडल के अंतर्गत शुरुआत में काफ़ी पैसे खर्च करने पड़ते हैं। हालांकि, इस मॉडल के अंतर्गत सोलर सिस्टम लगवाने पर लंबे समय में काफ़ी आर्थिक लाभ मिलते हैं। ऐसे में अगर आपके पास शुरुआत में निवेश करने के लिए पर्याप्त पैसे हैं, तो आपको कैपेक्स मॉडल के अंतर्गत सोलर सिस्टम लगवाना चाहिए।

 

सुविधा और जोखिम:

  • जोखिमों का बंटवारा: ओपेक्स मॉडल के अंतर्गत संचालन और प्रदर्शन संबंधी जोखिमों की ज़िम्मेदारी RESCo की होती है। वहीं, दूसरी तरफ़ कैपेक्स मॉडल के अंतर्गत किसी भी प्रकार के जोखिमों से ख़ुद ग्राहक को ही निपटना पड़ता है।
  • नियंत्रण और सुविधा: कैपेक्स मॉडल के अंतर्गत ग्राहकों का सोलर सिस्टम पर पूरा नियंत्रण होता है। जबकि, दूसरी तरफ़ ओपेक्स मॉडल के अंतर्गत ग्राहक आउटसोर्स मैनेजमेंट और रखरखाव की सुविधा का लाभ उठाते हैं।

 

सरकारी लाभ:

  • प्रोत्साहन और सब्सिडी: दोनों ही मॉडलों के लिये सरकार की तरफ़ से कुछ प्रोत्साहन और सब्सिडी का लाभ दिया जाता है। ओपेक्स और कैपेक्स दोनों मॉडल के अंतर्गत तुरंत टैक्स संबंधी लाभ मिलते हैं, लेकिन अन्य प्रोत्साहन अलग-अलग हो सकते हैं।
  • ग्रिड की समानता: ग्रिड की समानता सौर ऊर्जा और नियमित बिजली के बीच मूल्य निर्धारण की तरह है। जब सौर ऊर्जा की लागत सामान्य ग्रिड बिजली के बराबर होती है, तो यह दोनों विकल्पों को अधिक आकर्षक बनाती है। ऐसा लगता है कि दोनों बेहतर विकल्प बनने के लिए प्रतियोगिता कर रहे हैं।

 

निष्कर्ष:

भारत जैसे देश में जहां हर रोज़ सौर ऊर्जा के क्षेत्र में बदलाव हो रहे हैं, ओपेक्स और कैपेक्स मॉडल के बीच चयन करना थोड़ा मुश्किल काम है। एक तरफ़ जहां, ओपेक्स मॉडल में बिना किसी शुरुआती निवेश और जोखिम के सौर ऊर्जा का उपयोग किया जा सकता है, वहीं दूसरी तरफ़, कैपेक्स मॉडल के अंतर्गत सोलर पैनलों का मालिक बनकर भविष्य में काफ़ी पैसे बचाये जा सकते हैं। इन दोनों ही मॉडलों को अपनाने से पहले व्यवसायों और कंपनियों को अपनी वित्तीय स्थिति, जोखिमों और लंबे समय के अपने लक्ष्यों के बारे में समझदारी से विचार करना चाहिए।

जैसे-जैसे हमारा देश स्वच्छ और अधिक टिकाऊ ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है, सौर ऊर्जा, ऊर्जा के एक बेहतरीन विकल्प के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। चाहे लोग ओपेक्स मॉडल के अंतर्गत टीम बनाकर ऊर्जा की ज़रूरत पूरी करें या कैपेक्स मॉडल अपनाकर अपना ख़ुद का सोलर सेटअप करें। सौर ऊर्जा एक चमकती रोशनी की तरह है, जो हमें पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों की तुलना में एक स्वच्छ और बजट-अनुकूल विकल्प प्रदान करता है। साथ ही हमारे आने वाले भविष्य को प्रदूषण मुक्त और बेहतर बनाने में मदद करता है।

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